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मशरूम का बिस्किट, अचार, समोसा, खोवा, पकौड़ा और रवा के बाद अब लोग पनीर और गुलाब जामुन का भी स्वाद लेंगे। डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के विज्ञानियों ने इसे बनाने की तकनीक विकसित की है। इसे पेटेंट कराया जाएगा। 10 मई को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद , दिल्ली की वर्चुअल बैठक में इस पर मुहर लग चुकी है। पेटेंट प्रक्रिया पूरी होने के बाद व्यावसायिक उत्पादन के लिए किसानों व उद्यमियों को तकनीक से अवगत कराया जाएगा।
मशरूम विज्ञानी डा. दयाराम के नेतृत्व में छह महीने चले शोध के बाद ओएस्टर मशरूम से पनीर और गुलाब जामुन बनाने में सफलता मिली। एक किलो मशरूम से 400 ग्राम पनीर बनता है। मशरूम को पानी से अच्छी तरह से साफ करने बाद उसकी महीन पिसाई की जाती है। उसमें छेना का पानी डाला जाता है। इससे पेस्ट मशरूम का थक्का बनने लगता है। इसे अलग कर पनीर तैयार कर लिया जाता है। इसी तरह मशरूम के पेस्ट में करीब 20 फीसद खोवा मिलाकर गुलाब जामुन बनाया जाता है। वनस्पति घी में डीप फ्राई करने के बाद उसे चीनी की चाशनी में डाल दिया जाता है।
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पौष्टिकता रहेगी बरकरार
मशरूम विज्ञानी डा. दयाराम के अनुसार आसानी से सालभर उपलब्धता और कम कीमत के चलते पनीर व गुलाब जामुन बनाने में ओएस्टर मशरूम का इस्तेमाल किया गया। तैयार उत्पाद में मशरूम के सभी पौष्टिक तत्व मौजूद रहेंगे। लैब परीक्षण के दौरान 100 ग्राम पनीर में 19 ग्राम प्रोटीन पाया गया। इसके अलावा इसमें कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, आयरन, सोडियम, विटामिन सी और विटामिन बी काम्प्लेक्स जैसे तत्व भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। ओएस्टर मशरूम का थोक बाजार भाव 80 से 100 रुपये प्रति किलो है। एक किलो पनीर बनाने में लगभग 250 और गुलाब जामुन पर 350 रुपये खर्च होंगे।
मशरूम की कुछ प्रमुख प्रजातियां
मशरूम की कई प्रजातियां हैं। सूबे में ओएस्टर व बटन का उत्पादन अधिक हो रहा है। शिटाके और हेरेशियम जैसी औषधीय प्रजाति के मशरूम के बारे में भी किसानों को जानकारी दी जा रही है। बोआई के बाद ओएस्टर मशरूम 40 से 50 दिन में तैयार हो जाता है। इसे आसानी से धूप में सुखाया जा सकता है, इसलिए सेल्फ लाइफ जैसी समस्या नहीं होती।
सूबे में सालाना 8300 टन ओएस्टर मशरूम का उत्पादन
सूबे में सालाना 21 हजार 325 टन मशरूम का उत्पादन होता है, इसमें ओएस्टर की हिस्सेदारी करीब 8300 टन है। उत्तर बिहार का सालाना चार हजार टन मशरूम होता है। समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, मधुबनी, दरभंगा, चंपारण समेत अन्य जिलों के छोटे-बड़े एक हजार से अधिक किसान इसकी खेती कर रहे हैं।
इनपुट – दैनिक जागरण